महात्मा गाॅंधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम मजदूरी के भुगतान की गंभीर समस्या

 

डी.आर.मेश्राम

सहायक प्राध्यापक (वाणिज्य) शासकीय शहीद कौशल यादव महाविद्यालय गंडरदेही, जिला दुर्ग (छ.ग.)

 

भूमिका- प्रस्तुत शोध पत्र लेखक के पी.एच.डी. उपाधि ‘‘छ.ग. राज्य में ग्रामीण रोजगार की वर्तमान स्थिति तथा भविष्य के लिए रणनीतियां विषय पर आधारित है। 2 फरवरी, 2006 को देश में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम का क्रियान्वयन ग्रामीण विकास मंत्रालय (भारत सरकार) द्वारा किया गया है। 31 दिसंबर 2009 में योजना नाम बदलकर ‘‘महात्मा गाॅंधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी ’’ अधिनियम कर दिया गया। उल्लेखनीय है कि ‘‘महात्मा गाॅंधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी’’ अधिनियम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहला कानून है। इसमें रोजगार मजदूरी गारंटी किसी अनुमानित स्तर पर नही है। महात्मा गाॅंधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का प्रचलित नाम मनरेगा है जो ग्रामीण क्षेत्र में वयस्क परिवार को एक वर्ष में 100 दिनों के अकुशलता कार्य पर रोजगार की गारंटी प्रदान करता है। रोजगार गारंटी अधिनियम का नियम -

1.            महिला एवं पुरुषों में मजदूरी में कोई भेदभाव नही किया जावेगा।

2.            मजदूरी का भुगतान साप्ताहिक अथवा अधिकतम पाक्षिक आधार पर किया जावेगा।

 

शोध तकनीक

प्रस्तुत शोध पत्र में केवल एक योजना ‘‘मनरेगा’’ में छ.ग. राज्य में मजदूरी के भुगतान की समीक्षा की गई।

 

अध्ययन का क्षेत्रः-

प्रस्तुत शोध पत्र में राज्य के पूर्ववर्ती/6जिलों का अध्ययन किया गया है नये 11 जिलों को शामिल नही किया गया है।

 

अध्ययन का उद्देश्यः-

शोध पत्र में मनरेगा में दी जाने वाली मजदूरी के भुगतान की स्थिति का समावेश किया गया है। स्त्री पुरुष के मजदूरी की दर में समानता हैं अर्थात अकुशल कार्य के लिए मजदूरी की दर स्त्री/पुरुष के लिए एक समान है। दूसरा, महात्मा गाॅंधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में मनरेगा अधिनियम 2005 में मजदूरी का भुगतान पाक्षिक घोषित किया गया है।

 

अध्ययन का उद्देश्यः-

शोध पत्र में मनरेगा में दी जाने वाली मजदूरी के भुगतान की स्थिति का समावेश किया गया है। स्त्री/पुरुष के मजदूरी की दर में समानता है अर्थात अकुशल कार्य के लिए मजदूरी की दर स्त्री/पुरुष के लिए एक समान है। दूसरा, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में मनरेगा अधिनियम 2005 में मजदूरी का भुगतान पाक्षिक घोषित किया गया है।

 

अध्ययन वर्षः-

शोध अध्ययन में वर्ष 2007-08, 2009-10 तथा 2010-11 के आकड़ों का मूल्यांकन किया गया है।

 

आकड़ों का संकलनः-

अध्ययन में द्वितीयक तथा प्राथमिक आकड़ों का संकलन किया गया है।

 

उपकल्पनाः-

1.            छ.ग. में मनरेगा में मजदूरी का भुगतान 15 दिवस में नही किया जा सका।

2.            छ.ग. में मनरेगा का भुगतान-

अ.      15-30 दिनों में किया गया

ब.      31-60 दिनों में मजदूरी का भुगतान

स.      61-90 दिनों में तथा

द.      90 दिनों की अवधि की समाप्ति के पश्चात भुगतान किया गया।

 

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना-मूल्यांकनः-

वर्ष 2006-07 में देश के 200 जिलों में प्रथमचरण के अंतर्गत, वर्ष 2007-08 के दूसरे चरण में 130 जिलों में तथा तीसरे चरण 1 अप्रैल 2008 से समूचे देश के शेष जिलों में योजना का कार्यान्वयन किया गया। 1 अपै्रल 2008 से ग्रामीण रोजगार योजना का मनरेगा में विलय कर दिया।

 

छत्तीसगढ़ में वर्ष 2006-07 अर्थात प्रथम वर्ष की अवधि में राज्य के 11 जिलों में लागू की गई मनरेगा योजना में 12,56,737 ग्रामीण परिवारों को अस्थाई रोजगार दिया गया। वर्ष 2008-09 में छ.ग. राज्य में 22 लाख, 70415 परिवारों तथा वर्ष 2009-10 में 20 लाख 25,845 ग्रामीण परिवारों को मनरेगा के अंतर्गत रोजगार दिया गया। वर्ष 2012-13 में 18 लाख 48000 ग्रामीण परिवारों को मनरेगा में अल्पावधि का रोजगार दिया गया।

 

100 दिनों में रोजगार की गारंटी उपलब्धियाॅं असंतोषप्रदः-

मनरेगा में प्रावधान किया गया है कि ग्रामीण परिवारों में रोजगार की मांग करने पर एक वर्ष में कम से कम 100 दिनों के रोजगार उपलब्ध कराये जाने की मांग गारंटी है। परंतु जमीनी स्तर पर परिणाम असंतोषप्रद पाये गयेए छत्तीसगढ़ राज्य में:-

1.            वर्ष 2006-07 में 130302 परिवार जो कुल रोजगार प्राप्त परिवार संख्या 12,56,737 का 10.36 प्रतिशत है।

2.            वर्ष 2010-11 में 100 दिनों का रोजगार प्राप्त परिवारों की कुल संख्या 74070 अर्थात 3.40 प्रतिशत रिकाॅर्ड किया गया।

 

11वी पंचवर्षीय योजना (2007-2012) की मध्यावधि समीक्षा जो योजना आयोग, भारत सरकार द्वारा प्रकाशित (2011) किया गया है, देश के राज्यों में मनरेगा की स्थिति इस प्रकार रेखांकित की गई-

श्।े उंदल ंे 15 ेजंजमे ंिसस इमसवू जीम दंजपवदंस ंअमतंहमण् व्दसल 14 चमतबमदज ूवतामत ीवनेमीवसके बवउचसमजमक 100 कंले ूवताण् श्ज्ीम दंजपवदंस ंअमतंहम पदजमदेपजल व िूवता ूंे 48 कंलेण्श्

 

छ.ग. राज्य में मजदूरी के भुगतान की स्थिति 2010ः-

छ.ग. राज्य मजदूरी में भुगतान की स्थिति 2010 में मजदूरी के भुगतान की स्थिति इस प्रकार दर्ज की गईः

 

संकलित आकडों के मूल्यांकन से पता चलता है कि छ.ग. राज्य में वर्ष 2010 में महात्मा गाॅंधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में 53.27 प्रतिशत मजदूरी की कुल राशि 17 करोड़ 24 लाख 62,542 का भुगतान 16 से 30 दिनों की समाप्ति के पश्चात किया गया जो राष्ट्रीय ग्रामीण नियोजन गारंटी अधिनियम 2005 के विरुद्ध है।

 

छ.ग. राज्य में तीन महीने के पश्चात (90 दिनों के बाद) 8412 मस्टर रोल द्वारा 11.67 प्रतिशत मजदूरी की राशि 3 करोड. 77 लाख 80080 रुपये का भुगतान किया गया। उपलब्ध आकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ राज्य में विभिन्न वर्षों  में मनरेगा में अकुशल मजदूरों की (स्त्री/पुरुष) निम्नानुसार थी-

 

विलंबित भुगतान (क्मसंले पद च्ंलउमदजे) के संदर्भ में योजना आयोग की समीक्षा रिपोर्ट इस प्रकार है।

श्क्मसंले पद ूंहम चंलउमदजे ींअम मउमतहमक ंे जीम उवेज तिमुनमदजसल ीमंतक बवउचसंपदज नदकमत डछम्त्ळ।ण् ।ज जपउमे चंलउमदजे ींअम दवज इममद उंकम मअमद ंजिमत दपदम उवदजीेघ्

 

जनवरी 2012 से राज्य में नौ नये जिलों को राजस्व जिला घोषित किया गया-सुकमा,कांडागाॅंव, गरियाबंद, मुगेली, बालोद, बलौदाबाजार, बेमेतरा,सूरजपुर और बलरामपुर। तलिका-2 में वर्ष 2013-14 में राज्य के 27 जिलों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में विलंबित भुगतान की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की गई है। तलिका के मुल्यांकन से पता चलता है कि बस्तर संभाग के नारायणपुर जिलों में विभिन्न कालखंडों में न्यूनतम कुल 418.63 लाख रुपये का भुगतान किया गया जबकि सबसे अधिक मजदूरी के भुगतान की राशि 6883.97 लाख रुपये राजनांदगाॅंव जिले में दर्ज किया गया। जबकि मस्टर रोल की कुल संख्या 9,24,074 थी।

 

छत्तीसगढ़ राज्य के सभी 27 जिलों में वर्ष 2013-14 में कुल मस्टर रोल की संख्या 10720189 के माध्यम से कुल 80146.33 लाख रुपये का भुगतान किये जाने की की जानकारी है।

ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जारी की गई ‘‘मनरेगा समीक्षा’’(2006-20012) के अनुसार-

श्ज्ीम ब्वदजतवससवत व ि।नकपजवत ळमदमतंस ;छमू क्मसीप द्ध ंनकपज विनदक जींज बवचपमे व िडनेजमत त्वससे ूमतम दवज ंअंपसंइसम वित चनइसपब ेमतनपदह पद 246 ळतंउ चंदबींलंजे ंबतवेे  15 ेजंजमे पदबसनकपदह ।ेेंउए ब्ीींजजपेहंती भ्पउंबींस च्तंकमेीए न्ण्च्ण् व्तपेेें ंदक न्जजंतंाींदकश्

 

मस्टर रोल में अंकित जाली आकड़ों के बारे (थ्ंाम म्दजतपमे पद डनेजमत त्वसस) में भी कुछ सर्वे रिपोर्ट के हवाले से मनरेगा समीक्षा में छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के बारे में तथ्यों की जानकारी इस प्रकार प्रकाशित की गई

पद ैनतहनरं कपेजतपबज व िब्ीींजजपेहंती जीमतम ूमतम समंांहमे व िंतवनदक पिअम चमतबमदज

 

उपकल्पना की सत्यताः-

प्रस्तुत शोध पत्र में संकलित आकड़ों के अनुसार उपकल्पना छ.ग. में मनरेगा में मजदूरी का भुगतान 15 दिनों में नही किया जा सका तथा दूसरी उपकल्पना विभिन्न कालखंड जैसे 16-30, 31-60 दिन, 61-90 दिन, 91 दिनों के पश्चात किया गया जो कि राष्ट्रीय ग्रामीण नियोजन गारंटी अधिनियम 2005 में किये गये प्रावधान के विपरीत पाया गया।

 

निष्कर्षः-

छ.ग. राज्य में वर्ष 2012-13 में 2231.87 करोड़ रुपये व्यय किये गये जो कुल आबंटन (2610.79 करोड़) का 85.47 प्रतिशत तथा वर्ष 2013-14 में 79.20 प्रतिशत आबंटित धनराशि व्यय की गई। इसी प्रकार महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में 100 दिनों के अस्थाई रोजगार की उपलब्धियों भी अत्यंत निराशाजनक पाई गई। मनरेगा के अंतर्गत राष्ट्रीय औसत 48 दिवस में रोजगार का रिकार्ड किया गया।

 

संदर्भित गं्रथ

1.            राष्ट्रीय ग्रामीण नियोजन गारंटी अधिनियम 2005 सुविधा ला हाउस प्रा.लि. भोपाल अपै्रल 2006

2.            प्रशासनीय प्रतिवेदनपंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग,छ.ग. शासन रायपुर 2007-08, 2009-10 तथा 2010-11

3.            छत्तीसगढ़ 2012 जनसंपर्क संचालनालय, नवंबर 2012, रायपुर।

4.            छ.ग. में ग्रामीण रोजगार की वर्तमान स्थिति तथा भविष्य के लिए रणनीतियाॅं पी.एच.डी. शोध प्रबंध (वाणिज्य) डाॅ. धनराज मेश्राम, सहा. प्राध्यापक, वाणिज्य संकाय, शासकीय शहीद कौशल यादव महाविद्यालय गंुडरदेही।

5.            छत्तीसगढ़ संदर्भ-2014 जनसंपर्क संचालनालय रायपुर

1-    Mid-Term Appraisal 11 th five year plan, planning commission govt of india New Delhi.

 

 

Received on 12.11.2014       Modified on 25.11.2014

Accepted on 15.12.2014      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Rev. & Res. Social Sci. 2(4): Oct. - Dec. 2014; Page 223-225